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संप्रेषण प्रक्रिया

 संप्रेषण प्रक्रिया क्या है?


संप्रेषण प्रक्रिया में संप्रेषक के साथ-साथ संप्रेषण के माध्यम और प्रापक या लक्षित समूह की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। यदि इनमें परिवर्तन होता है तो संप्रेषण की प्रक्रिया में भी परिवर्तन हो जाता है। संप्रेषण प्रक्रिया में संप्रेषक अपना संदेश संचार माध्यम या मार्ग द्वारा प्रापक तक पहुँचाता है। अर्थात्‌ यहाँ चार तत्व महत्वपूर्ण है- संप्रेषक, संदेश, माध्यम और प्रापक।


संप्रेषण प्रक्रिया के अध्ययन और विकास के साथ इसके अन्य तत्व भी सामने आए जिनकी संप्रेषण में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अब संप्रेषण की प्रक्रिया तभी पूर्ण समझी जाती है जब उसकी प्रतिक्रिया या प्रतिपुष्टि (फीड बैक) प्रापक के द्वारा प्राप्त हो जाती है। संप्रेषण में संप्रेषक और प्रापक में समता भी होनी चाहिए, क्योंकि विषमता की स्थिति में संप्रेषण अवरुद्ध हो जाता है। दोनों के बीच समता इसलिए जरूरी है क्योंकि माध्यमों में हो रहे बहु-मुखी परिवर्तनों के कारण अब संप्रेषक संदेश की सीधी अभिव्यक्ति के साथ-साथ सामाजिक, सांस्कृतिक तथा भाषाई प्रतीकों या चिह्नों का कूट भी बनाता है जिसे प्रापक को डिकोड कर संदेश ग्रहण करना और प्रतिपुष्टि देना होता है। अंत: संप्रेषक और प्रापक के मध्य संदेश की भाषा, संकेत, प्रतीक एवं सूचना तत्व के स्तर पर समानता होनी चाहिए।


संप्रेषण प्रक्रिया के मुख्य तत्व 


(Main Components of Communication Process)


संप्रेषण प्रक्रिया के प्रमुख सात संघटक या मूल तत्व होते हैं जो संप्रेषण को सार्थक बनाते हैं। संप्रेषण प्रक्रिया के प्रमुख संघटक तत्व निम्नलिखित हैं- विचार, संप्रेषक, माध्यम, संदेश, संकेतीकरण, प्रापक तथा प्रतिपुष्टि


1. विचार (Idea)


किसी संदेश को प्रेषित करने से पूर्व संप्रेषक के मस्तिष्क में उस संदेश के संबंध में जो विचार आता है, जिसे वह प्रापक को प्रेषित करना चाहता है। प्रत्येक लिखित या मौखिक संदेश विचार की उत्पत्ति से प्रारम्भ होता है। अत: मस्तिष्क में उठने वाला कोई भी उद्दवेग जिसे व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के साथ साझा करना चाहता है, मूल रूप में वही विचार है। कहने का तात्पर्य यह है की संप्रेषण की प्रक्रिया का पहला चरण विचार है।


2. संप्रेषक (communicatior)


संप्रेषक प्रेषक, संप्रेषणकर्त्ता या संदेश देने वाले व्यक्ति को कहते हैं। इसी के द्वारा संदेश का प्रेषण किया जाता है, यही संदेश का श्रोत होता है। संप्रेषक ही संप्रेषण प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। संप्रेषक के आभाव में कोई भी संप्रेषण प्रक्रिया की कल्पना नहीं की जा सकती है। क्योंकि यही संप्रेषण प्रक्रिया का सूत्रधार होता है।


संप्रेषक के गुण


संप्रेषक में कुछ गुणों का होना जरूरी है ताकि संप्रेषण प्रभावशाली तरीके से हो सके। संप्रेषक के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं-


(क) संप्रेषक को अपने पूर्वाग्रहों व तनावों से मुक्त होना चाहिए। उसे अपने प्रति रवैया (डर से हाँथ-पैर काँपना), विषयवस्तु के प्रति उसकी धारणा तथा प्रापक के प्रति आचार-व्यवहार आदि को ध्यान रखना चाहिए। उसे संप्रेषण से पूर्व संप्रेषण की वास्तविक आवश्यकता का विश्लेषण अवश्य कर लेना चाहिए।

ख) संप्रेषक को संदेश संचारित करने से पहले प्रापक संबंधी सभी जानकारियाँ प्राप्त कर लेनी चाहिए। एक संप्रेषक द्वारा संदेश को प्रसारित करने के पूर्व, प्राप्तकर्त्ता की एकाग्रता कर लेनी चाहिए अर्थात्‌ इस बात की जानकारी कर लेनी चाहिए कि प्रापक संदेश ग्राह्यता के प्रति कितना संवेदनशील है। संप्रेषक को संदेश प्रापक तक प्रत्यक्षतः व्यावहारिक रूप में अपने उद्देश्य के अनुरूप संप्रेषित करना चाहिए।


(ग) संप्रेषक के अंदर बोलने वाले वे सारे गुण होने चाहिए जो श्रोता को आकर्षित करे। उसके द्वारा संदेश की पुनरावृत्ति करनी चाहिए जिससे प्रापक को संदेश का वास्तविक अर्थ में समझने में मदद मिले।


(घ) संप्रेषक को भाषाई कौशल (बोलना, पढ़ना, लिखना और सुनना) में पारंगत होना चाहिए। क्योंकि भाषाई कौशल संप्रेषण प्रक्रिया का महत्वपूर्ण उपकरण है। इसके अभाव में संप्रेषण प्रभावहीन हो जाएगा। संप्रेषक के पास पर्याप्त शब्द भंडार की जानकारी होनी चाहिए ताकि वह स्पष्ट एवं सटीक संदेश लिख या व्यक्त कर सके।



(ड़) संप्रेषक द्वारा संदेश में प्रयुक्त किए जाने वाले संकेत सुबोध व सरल होने चाहिए ताकि उन्हें प्रापक आसानी से समझ सके। क्योंकि संप्रेषक अनेक संकेतों द्वारा, हाव-भाव द्वारा, अपनी भाषा द्वारा संदेश प्रापक के पास भेजता है, जिसे वह पढता और सुनता है और उन्हें समझ कर प्रतिपुष्टि देने का प्रयास भी कर्ता है। संप्रेषक को सदैव संप्रेषण क्रियाओं एवं संप्रेषित विचारों के मध्य संगति बना कर रखना चाहिए।


(च) संप्रेषक को संदेश इस तरह प्रसारित करना चाहिए की वह प्रापक के पास समय से पहुँच जाये, नहीं तो प्रापक को संदेश के प्रति विभ्रम पैदा हो सकता है।



(छ) प्रेषक को विषयवस्तु की सही समझ, प्रापक की समझ और आवश्यकता की जानकारी होनी चाहिए तभी प्रभावी संप्रेषण की संभावना बनेगी।



(ज) प्रेषक को संप्रेषण सामाजिक एवं सांस्कृतिक व्यवस्था को ध्यान रखते हुए करना चाहिए। भिन्न-भिन्न वर्गों और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से आये लोगों के लिए अलग-अलग ढंग से संप्रेषण करना चाहिए। जैसे- उत्तर और दक्षिण भारत या भारतीय-रसियन-अमेरिकन के लोगों के लिए एक जैसा संप्रेषण नहीं हो सकता।


3. माध्यम (channel)


माध्यम संप्रेषक और प्रापक के बीच सेतु का काम करता है। माध्यम कुछ भी हो सकता है जिसे संप्रेषक स्वयं को प्रापक से जुड़ने के लिए उपयुक्त समझता है और उसे प्रयोग करता है जैसे- आपसी बातचीत, पत्राचार, सभा या मीटिंग, समाचार-पत्र, टेलीफ़ोन, मोबाईल, रेडियो, टेलीविजन, इंटरनेट आदि। ये सभी माध्यम संप्रेषक को अपना संदेश प्रापक तक पहुँचाने में सहायता करते हैं। माध्यम का चुनाव पर संप्रेषण की सफलता निर्भर करती है इसलिए इसका चुनाव संप्रेषक को सावधानी से करना चाहिए।


संदेश को लक्षित समूह तक पहुँचाने के लिए संप्रेषक द्वारा अनुकूल माध्यम का चयन किया जाता है, यह प्रक्रिया संचार माध्यम द्वारा संपन्न की जाती है। इसीलिए संचार उद्योग के विकास के समय ‘माध्यम ही संदेश है’ की बात उठी थी किंतु आज संदेश और माध्यम का भेद सर्वविदित है।


4. संदेश (Message)


संप्रेषक जब बोलकर, लिखकर, चित्र या संकेतों के माध्यम से अपने विचार को प्रस्तुत करता है तब वह संदेश कहलाता है। संदेश में सूचना, विचार, संकेत, दृष्टिकोण, निर्देश, आदेश, परिवेदन, सुझाव, आदि शामिल हैं। संप्रेषक को संदेश प्रेषित करने से पहले यह ध्यान रखना चाहिए की संदेश की विषय-वस्तु क्या है? उसका विवेचन कैसे करना है? किस माध्यम से प्रसारण करना है? किनके बीच संदेश संप्रेषित करना है? संदेश की भाषा का क्या स्तर रखना है? और इन बातों पर संप्रेषक को संदेश भेजने से पहले विचार करना होता है। यदि संप्रेषक इन बातों को ध्यान नहीं देता है तो संप्रेषण विफल हो जाता है। जैसे ग्रामीण लोगों के साथ उनके स्तर और भाषा में यदि संदेश न भेजा जाए तो संदेश संप्रेषित नहीं हो पायेगा।


संदेश की प्रमुख विशेषताएं


संदेश की निम्नलिखित विशेषताएं होनी चाहिए-


(क) एक अच्छे संदेश की भाषा सरल, स्पष्ट तथा समग्रता लिए हुए होनी चाहिए। उसकी प्रस्तुतिकरण में क्रमबद्धता भी होनी चाहिए।


(ख) संदेश के प्रसारण वह क्षमता होनी चाहिए कि वह प्रापक का ध्यान आकर्षित कर सके। यह तभी संभव है जब संदेश सरल, स्पष्ट तथा आकर्षक हो और प्रापक के सामाजिक एवं सांस्कृतिक वातावरण के अनुकूल हो।



(ग) संदेश का निर्माण प्रापक की आवश्यकतानुसार, उसकी जरूरतों, रुचियों और मनोवृत्तियों को ध्यान में रखकर करना चाहिए।



(घ) संदेश में उन्हीं प्रतीकों, चिन्हों या संकेतों का प्रयोग करना चाहिए जो संप्रेषक और प्रापक दोनों के लिए समान अर्थ रखते हों ताकि संप्रेषक ठीक से अभिव्यक्त कर सके और प्रापक अच्छे से समझ सके।


(ड़) संदेश से वही अर्थ निकलना चाहिए जिसे संप्रेषक ने प्रसारण किया है, भेजा है। यदि प्रापक कोई इतर अर्थ ग्रहण कर्ता है तो संप्रेषण प्रक्रिया विफल मानी जाएगी। इसका मतलब यह नहीं की दोनों में मतैक्य ही हो, दोनों में मतभेद हो सकता है। संदेश पर दोनों की राय अलग-अलग हो सकती है।


(च) संदेश का विवेचन इस प्रकार होना चाहिए कि प्रापक सुनने, जानने और ग्रहण करने के लिए मजबूर हो जाए।


5. संकेतीकरण एवं संकेतवाचन (encoding & decoding)


संचार माध्यमों के विकास के साथ-साथ संप्रेषण के रूप में परिवर्तन होता गया। अब संप्रेषण केवल पारम्परिक माध्यमों- आमने-सामने. या पत्र-पत्रिकाओं तक सीमित नहीं रह गया है। रेडियो, दूरदर्शन, इंटरनेट आदि के विकास की वजह से इसमें व्यापकता आ गई है। इनकी वजह से संप्रेषण प्रक्रिया में कई नई बातें जुड़ गई हैं। सूचना प्रौद्योगिकी के विकास से संप्रेषण प्रक्रिया में बहुमुखी परिवर्तन आए तो साथ ही प्रापक द्वारा संदेश ग्रहण करने की प्रक्रिया में भी बदलाव आया है।

इन नये माध्यमों में संदेश भेजने से पहले शब्दों और चित्रों का संकेतीकरण किया जाता है अर्थात इन्हें ध्वनि एवं तरंगों में परिवर्तित किया जाता है। संप्रेषक अपने भाव, विचार, सूचना को संप्रेषित करने के लिए भाषा, दृश्य, बिंब, प्रतीक, संगीत आदि को संकेत रूप में उपयोग में लाता है, इसे संकेतीकृत करना कहते हैं। संदेश संकेतीकृत करने की प्रक्रिया में इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि संकेत सही रूप में विचार को अभिव्यक्त करने योग्य हो। इसके लिए आवश्यक है कि संदेश इस प्रकार संकेतीकृत किया जाए जिसकी परिकल्पना संप्रेषक और प्रापक दोनों के मस्तिष्क में समान रूप से संरचित हो।


संदेश लक्षित स्थान पर पहुँचने के बाद इनका संकेतवाचन किया जाता है। अर्थात इन तरंगों को पुन: शब्दों एवं चित्रों में परिवर्तित किया जाता है। इसमें प्रापक की सामाजिक-सांस्कतिक पृष्ठभूमि, भाषा बोध की क्षमता, उसका अनुभव-जगत आदि कारक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्रापक इसी समझ-बोध से संदेश को अपने तरीके से पढ़ता-सुनता-समझता है। इस प्रक्रिया को संकेतवाचन कहा जाता है। संप्रेषण प्रक्रिया में यह बात ध्यान देने योग्य है कि संकेतवाचन करते हुए प्रापक सामान्य रूप से अपनी अभिरुचि के अनुसार ही संदेश को ग्रहण करता है। इस प्रकार संकेतीकरण एवं संकेतवाचन के बाद भेजी गई सूचना प्रापक के पास पहुँचती है।


6. प्रापक (Receiver)


संप्रेषण में दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्षकार संदेश प्रापक है। संप्रेषक द्वारा भेजे गए संदेश को प्राप्त करने वाले को प्रापक कहा जाता है। इसके बिना संप्रेषण की प्रक्रिया पूर्ण नहीं हो सकती। संप्रेषण श्रृंखला के एक छोर पर जहाँ संप्रेषक होता है वहीं दूसरी छोर पर प्रापक। प्रापक कोई व्यक्ति हो सकता है, जनसमूह या जन समुदाय भी। संप्रेषक और प्रापक के बीच जितनी समानता होगी उतना ही प्रभावी संप्रेषण होता है। संप्रेषक द्वारा भेजे गए संदेश को जब प्रापक प्राप्त कर लेता है तभी संप्रेषण की प्रक्रिया पूर्ण होती है।


प्रापक के प्रकार


किसी भी संगठन में पाँच प्रकार के प्रापक (श्रोता) पाये जाते हैं-


(क) प्रारम्भिक प्रापक


संप्रेषक से संदेश को सर्वप्रथम प्राप्त करने वाला श्रोता प्रारम्भिक प्रापक कहलाता है। इसी के द्वारा संदेश दूसरे प्रापक या श्रोताओं की ओर प्रवाहित किया जाता है।


(ख) माध्यमिक प्रापक


ऐसा प्रापक जो संदेश को प्राथमिक प्रापक तक पहुँचने से पहले संदेश को रोक रखने में सक्षम होता है माध्यमिक प्रापक कहलाता है। जैसे किसी अधिकारी का सचिव यह तय करता है कि उसे अधिकारी से प्राप्त सूचना या आदेश को किस व्यक्ति को और कब संप्रेषित करना है, यह माध्यमिक प्रापक का कार्य करता है।


(ग) प्राथमिक प्रापक


प्राथमिक प्रापक द्वारा यह तय किया जाता है कि संदेश द्वारा दिये गये आदेशों, परामर्शों को स्वीकार करना चाहिये या नहीं। इसी प्रापक के पास ही निर्णय लेने की क्षमता होती है तथा संदेश संप्रेषक को अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिये इसी के पास ही आना पड़ता है।


(घ) द्वितीयक प्रापक


द्वितीयक प्रापक वह है जिसे संदेश पर टिप्पणी करने के लिये कहा जाता है। द्वितीयक प्रापक संदेश को मान्यता मिलने के बाद उसे प्रभाव में लाता है।


(ड़) निरीक्षक प्रापक


ऐसा प्रापक जिसके पास सभी शक्तियाँ उपलब्ध होती हैं, निरीक्षक प्रापक कहलाता है। यह राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक रूप से सबल होता है। यद्यपि निरीक्षक प्रापक संदेश को रोकने की शक्ति नहीं रखता, वह सीधे तौर पर प्राप्त संदेश पर कोई कार्यवाही नहीं कर सकता फिर भी वह प्रेषक तथा प्रापक के बीच हुए आदान-प्रदान पर पूर्ण ध्यान देता है। वह अपनी भविष्य की कार्यवाही का आधार संदेश के विश्लेषण को बना सकता है।


प्रापक विश्लेषण


चूँकि संप्रेषक संप्रेषण प्रक्रिया के जरिए संदेश को प्रापक तक पहुँचाता है। इसलिए विचारों से उत्पन्न संदेश को सही रूप में प्रापक तक पुहँचाने के लिए यह आवश्यक है कि वह प्रापक तक संदेश प्रेषण से पहले उसे विश्लेषित कर ले ताकि प्रापक की प्रतिक्रिया जानने की प्रक्रिया सरल बन सके। सर्वप्रथम उसे यह पता करना चाहिए कि संदेश को प्राप्त करने वाले कौन है/हैं? संवाद के प्रति उनकी संभावित प्रतिक्रिया क्या हो सकती है? संचार की विषयवस्तु के बारे में वह/वे कितना जानते हैं? संप्रेषक के साथ उनका क्या संबंध हैं?


प्रापक विश्लेषण की विधि


प्रापक किस आकार व प्रकार का है?


प्राथमिक प्रापक कौन है?


प्रापक से प्रतिपुष्टि की क्‍या संभावना है?


प्रापक का विवेक स्तर क्या है?


प्रापक के साथ उसका क्‍या संबंध है?


यदि संप्रेषक प्रापक के बारे में पूरी जानकारी रखता है तो प्रापक विश्लेषण शीघ्रता से हो जाएगा। परन्तु यदि वह प्रापक के बारे में अनभिज्ञ है तथा संदेश अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है, तो संप्रेषक के लिये यह आवश्यक है कि वह श्रोता के विश्लेषण को गंभीरता से ले तथा उसके विश्लेष्ण के लिए कुछ समय निकाले। व्यावहारिकता की दृष्टि से लिखित संदेश को इस प्रकार लिखे कि प्रापक उसको कम परिश्रम तथा समय में समझ जाए। यदि संदेश मौखिक हो तो सर्वप्रथम प्रापक को संदेश की रूपरेखा भेजे तथा उसके बाद अपने विचारों को सरल, स्पष्ट एवं विवेकपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करे।


7. प्रतिपुष्टि (Feedback)


इसका संबंध संप्रेषक द्वारा भेजे गए संदेश या सूचना का प्रापक पर पड़ने वाले प्रभाव से है। यह संदेश प्रापक की प्रतिक्रिया के अनुकूल और प्रतिकूल कुछ भी हो सकता है। प्रापक द्वारा संदेश के संबंध में की गई अभिव्यक्ति या प्रतिक्रिया को ही प्रतिपुष्टि कहते हैं। संप्रेषण प्रक्रिया में प्रतिपुष्टि का बहुत महत्वपूर्ण होता है, इसी से पता चलता है कि प्रापक के पास संदेश किस रूप में पहुँचा? संप्रेषक जो संदेश प्रापक के पास भेजना चाहता था वही पहुँचा या कुछ और? पहुँचा भी कि नहीं? संदेश का बोध हो जाने पर प्रापक जो प्रतिक्रिया या प्रतिपुष्टि करता है उसी से स्पष्ट होता है कि संप्रेषण सार्थक हो पाया या नहीं। इस प्रकार फीडबैक संप्रेषण व्यवस्था में संतुलन और स्थिरता कायम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि संप्रेषण की प्रक्रिया में वे सभी साधन सम्मिलित हैं जो अर्थ और समझ का विनिमय करते हैं, संप्रेषण को सार्थक बनाते हैं।

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