दूर-संचार साधनों के क्षेत्र में आज क्रांति हुई है तथा दूरभाष (टेलीफोन) जैसे साधन सर्व-सुलभ होने के अतिरिक्त उपयोग भी सिद्ध हुए हैं। इन साधनों के बावजूद आज भी पत्रों के महत्व को नकारा नहीं जा सकता है। अनेक दृष्टियों से पत्र लेखन (Patra Lekhan in Hindi) आवश्यक और उपयोगी हैं। यही नहीं, आधुनिक युग में पत्रों के प्रकार और आकार विषय और शैली में भी परिवर्तन हुए हैं।
एक ओर पत्र के माध्यम से हम वैयक्तिक विचार, चिंतन, अनुभूति और संवेदनाओं की अभिव्यक्ति करते हैं, तो दूसरी ओर व्यापार और व्यवसाय के क्षेत्र मे, कार्यालय की औपचारिकताओं के संदर्भ में तथा पत्र-पत्रिकाओं में अपनी समस्याओं को प्रकाशित करवाने में भी पत्र-लेखन को ही महत्व देते हैं। अतएव इस युग में पत्र-लेखन का भी विशेष महत्व हैं।
प्रभावशाली पत्र लेखन एक कला है, जो दूसरों को प्रभावित ही नहीं करती है, अपितु उद्देश्य-पूर्ति में भी सहायक होती है। पत्र की विषय-वस्तु, भाषा तथा शैली, लेखक की योग्यता, मनःस्थिति, वैचारिकता एवं संवेदनात्मकता को प्रकट करती है। अवसर के अनुकूल ही पत्रों का स्वरूप, भाषा और विषय निर्धारित होते हैं। अतः पत्र व्यक्तित्व की अभिव्यंजना करने में समर्थ होते हैं।
पत्रों के प्रकार- पत्रों को विषय वस्तु एवं शैली के आधार पर दो वर्गों में वर्गीकृत कर सकते हैं:
- औपचारिक पत्र (Formal Letter)
- अनौपचारिक पत्र (Informal Letter)
औपचारिक पत्र (Formal Letter)
सरकारी, अर्धसरकारी और गैर-सरकारी संदर्भों में औपचारिक स्तर पर भेजे जाने वाले पत्रों को औपचारिक पत्र कहते हैं। इनमें व्यावसायिक, कार्यालयी और सामान्य जीवन-व्यवहार के संदर्भ में लिखे जाने वाले पत्रों (patra lekhan) को शामिल किया जा सकता है। इन पत्रों में संक्षिप्तता, स्पस्टता और स्वतःपूर्णता की अपेक्षा रहती हैं औपचारिक पत्रों के अंतर्गत दो प्रकार के पत्र आते हैं-
(क) सरकारी, अर्धसरकारी और व्यावसायिक संदर्भों में लिखे जाने वाले पत्र - इनकी विषयवस्तु प्रशासन, कार्यालय और करोबार से संबंधित होती है। इनकी भाषा-शैली निश्चित सांचे में ढली होती है और प्रारूप निश्चित होता है। सरकारी कार्यालयों, बैंकों और व्यावसायिक संस्थाओं द्वारा किया जाने वाला पत्र व्यवहार इस वर्ग के अंतर्गत आता है। विभिन्न पदों के लिए लिखे गए आवेदन पत्र भी इसी श्रेणी में आते हैं।
(ख) सामान्य जीवन व्यवहार तथा अन्य विशिष्ट संदर्भों में लिखे जाने वाले पत्र - ये पत्र परिचित एवं अपरिचित व्यक्तियों को तथा विविध क्षेत्रों से संबद्ध अधिकारियों को लिखे जाते हैं। इनकी विषयवस्तु सामान्य जीवन की विभिन्न स्थितियों से संबद्ध होती है। ये प्रायः सामान्य और औपचारिक भाषा-शैली में लिखे जाते हैं। इनके प्रारूप में प्रायः स्थिति और संदर्भ के अनुसार परिवर्तन हो सकता है। इनके अंतर्गत शुभकामना-पत्र, बधाई-पत्र, निमंत्रण-पत्र, शोक-संवेदना पत्र, पूछताछ पत्र, शिकायती पत्र, समस्यामूलक पत्र, संपादक को पत्र आदि आते हैं।
अनौपचारिक पत्र (Informal Letter)
इस प्रकार के पत्रों में पत्र लिखने वाले और पत्र पाने वाले के बीच नजदीकी था घनिष्ठ संबंध होता है। यह संबंध पारिवारिक तथा अन्य हो सगे-संबंधियों का भी हो सकता है और मित्रता का भी। इन पत्रों को व्यक्तिगत पत्र भी कहते हैं। इन पत्रों की विषयवस्तु निजी और घरेलू होती है। इनका स्वरूप संबंधों के आधार पर निर्धारित होता है। इन पत्रों की भाषा-शैली प्रायः अनौपचारिक और आत्मीय होती है।
पत्र के अंग (Parts of Letter)
पत्र चाहे औपचारिक हो या अनौपचारिक, सामान्यतः पत्र के निम्नलिखित अंग होते हैं, जैसे-
- पता और दिनांक
- संबोधन तथा अभिवादन शब्दावली का प्रयोग
- पत्र की सामग्री
- पता की समाप्ति, स्वनिर्देश और हस्ताक्षर
आइए, अब इनके बारे में जानकारी प्राप्त कर लें-
पता और दिनांक - पत्र के बाई ओर कोने में पत्र-लेखक का पता लिखा जाता है और उसके नीचे तिथि दी जाती है।
संबोधन तथा अभिवादन - जब हम किसी को पत्र लिखना (patra lekhan) शुरू करते हैं तो उस व्यक्ति के लिए किसी न किसी संबोधन शब्द का प्रयोग किया जाता है। जैसे- पूज्य/आदरणीय/पूजनीय/श्रद्धेय/प्रिय/प्रियवर/मान्यवर
1. प्रिय - संबोधन का प्रयोग निम्नलिखित स्थितियों में किया जाता है-
- अपने से छोटे के लिए
- अपने बराबर वालों के लिए
- घनिष्ठ व्यक्तियों के लिए
औपचारिक स्थिति में-
- मान्यवर/प्रिय महोदय/महोदया
- प्रिय श्री / श्रीमती / सुश्री / नाम या उपनाम
- प्रिय - नाम - जी आदि।
अनौपचारिक पत्रों में महोदय / महोदय संबोधन शब्द के बाद अल्पविराम का प्रयोग नहीं किया जाता है, क्योंकि अगली पंक्ति में हमें अभिवादन के लिए कोई शब्द नहीं देना होता हैं।
अनौपचारिक पत्रों में अपने से बड़े के लिए नमस्कार, नमस्ते, प्रमाण जैसे अभिवादनों का प्रयोग होता है।
जब स्नेह, शुभाशीष, आर्शीवाद जैसे अभिवादनों का प्रयोग होता है तो मात्र संबोधन देखते ही हम समझा जाते हैं कि संबोधित व्यक्ति लिखने वाले से आयु में छोटा है। औपचारिक पत्रों में इस प्रकार के अभिवादन की आवश्यकता नहीं रहती।
अभिवादन शब्द लिखने के बाद पूर्ण विराम अवश्य लगाना चाहिए, जैसे-
- पूज्य भाई साहब,
- सादर प्रणाम,
- प्रिय विवेक,
- प्रसन्न रहो।
पत्र- सामग्री - पत्रों में अभिवादन के बाद पत्र की साम्रगी देनी होती है। पत्र के माध्यम से जो हम कहना चाहते हैं या कहने जा रहे हैं वही पत्र की सामग्री कहलाती है।
पत्र की समाप्ति, स्वनिर्देश और हस्ताक्षर - अनौपचारिक पत्र के अंत में लिखने वाले और पाने वाले की आयु, अवस्था तथा गौरव-गरिमा के अनुरूप् स्वनिर्देश बदल जाते हैं, जैसे - तुम्हारा, आपका, स्नेही, आपका आज्ञाकारि, शुभचिंतक, विनीत आदि।
औपचारिक पत्रों का अंत प्रायः निर्धारित स्वनिर्देश द्वारा होता है, यथा - भवदीय, आपका शुभेच्छु आदि।
इसके बाद पत्र-लेखक के हस्ताक्षर होते हैं। औपचारिक पत्रों में हस्ताक्षर के नीचे प्रायः प्रेषक का पूरा नाम और पदनाम लिखा जाता है।
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