भावपल्लवन
परिभाषा
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भावपल्लवन / भावविस्तार का अर्थ है किसी विचार, उक्ति, लोकोक्ति, सूक्ति आदि में निहित भावों को विस्तारपूर्वक स्पष्ट करना।
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जब कोई वाक्य छोटा-सा हो लेकिन उसमें गहरे अर्थ छिपे हों, तो उसे अच्छी तरह समझाने के लिए उसके भावों का विस्तार करना आवश्यक होता है।
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इसे भाव–विस्तार, विस्तार–लेखन या भावपल्लवन भी कहा जाता है।
उद्देश्य
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संक्षिप्त उक्ति या लोकोक्ति के छिपे भाव को स्पष्ट करना।
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पाठक/श्रोता को यह अनुभव कराना कि उक्त विचार जीवन में क्यों महत्त्वपूर्ण है।
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साहित्यिक लेखन की क्षमता और अभिव्यक्ति को विकसित करना।
उदाहरण
उदाहरण 1
सूक्ति: “लोकशक्ति हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।”
भावपल्लवन:
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प्रत्येक मनुष्य को स्वतंत्र जन्म लेने का अधिकार है।
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स्वतंत्रता किसी पराई कृपा नहीं, बल्कि जन्म से मिला हुआ अधिकार है।
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स्वतंत्र होना किसी अन्य के प्रति विद्रोह नहीं, बल्कि आत्मसम्मान है।
यहाँ लोकशक्ति शब्द से स्वतंत्रता, अधिकार और आत्मसम्मान — ये सब भाव पल्लवित होकर निकलते हैं।
उदाहरण 2
सूक्ति: “जहाँ स्नेह रहता है, वहाँ समृद्धि भी रहती है।”
भावपल्लवन:
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स्नेह से समाज में मेलजोल और भाईचारा बढ़ता है।
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स्नेह से ही सुख और सफलता का जन्म होता है।
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जहाँ स्नेह नहीं, वहाँ कलह, ईर्ष्या और दुःख उत्पन्न होते हैं।
उदाहरण 3
सूक्ति: “ईर्ष्या बुरी वस्तु है, पर परिश्रम उससे भी अच्छी वस्तु है।”
भावपल्लवन:
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ईर्ष्या करने से व्यक्ति दुःखी होता है।
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ईर्ष्या का दुष्परिणाम समाज में कलह और असंतोष है।
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लेकिन यदि परिश्रम किया जाए तो वही शक्ति सुख, समृद्धि और सम्मान देती है।
निष्कर्ष
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भावपल्लवन = संक्षिप्त वाक्य या सूक्ति का विस्तृत अर्थ प्रकट करना।
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इसमें मूल भाव का विस्तार, व्याख्या और तर्क प्रस्तुत किया जाता है।
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यह अभ्यास लेखन कौशल को प्रखर और भाषा को प्रभावी बनाता है।
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